लघु उद्योग में श्रमिकों का अध्ययन

(यूनीक स्ट्रक्चर एवं टावर्स लिमिटेड उरला, जिला-रायपुर)

 

अल्का रात्रे1 एवं .के. पाण्डेय2

1शोध छात्रा, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (..)

2आचार्य, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (..)

 

 

सरांश

किसी भी उद्योग में श्रम कल्याण एवं सामाजिक सुरक्षा का अपना विशेष महत्व होता है। यदि श्रम कल्याण एवं सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को कंपनी में सही ढंग से लागू किया जाये तो श्रमिकों का कार्य में मन लगा रहता है और यदि सही ढंग से लागू हो तो कार्य ऊबाव लगने लगता है। आज जब श्रमिक केवल मजदूरी कमाने के रूप में रह गया है और जब यहां के श्रमिक औद्योगिक आजीविका को एक आवश्यक बुराई मानकर सदैव इससे छुटकारा पाने के लिए प्रयास कर रहा है, श्रम कल्याण कार्य एवं सामाजिक सुरक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण हो गये हैं। श्रम कल्याण एवं सामाजिक सुरक्षा के माध्यम से हम केवल श्रमिकों के मानवीय जीवन के लिए उचित एवं आवश्यक सुख सुविधाएं जुटा सकते हैं, बल्कि उनमें नागरिक उत्तरदायित्व की भावना भी विकसित कर सकते हैं।

 

 

प्रस्तावना

 

किसी भी देश में उद्योगों का होना उसकी प्रगति का सूचक है। देश की प्रगति में उद्योग, श्रम, श्रमिक तथा प्रबंधन की अहम् भूमिका होती है। आज की औद्योगिक प्रगति पूरी तरह से श्रमिकों पर निर्भर होती है। वर्तमान औद्योगिक अशांति विश्व की एक गंभीर समस्या है। श्रम संघर्ष का इतिहास श्रमिकों के द्वारा अपने हितों के लिए की जाने वाली मांग के लिए कुछ नहीं है।

 

स्वतंत्रता के बाद देश के चहुमुंखी विकास में जहां हमें विकासशील राष्ट्रों कि पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया है वहीं हमारे देश में कई समस्याओं ने जन्म लिया है। इन्हीं समस्याओं में से श्रमिक की कुछ समस्याएं ऐसी श्रेणियों की है, जिनका विकास गरीबी, आर्थिक दशाओं, बड़े परिवार तथा ऋणों के कारण अंधकारमय हैं। श्रमिकों को अस्वस्थ वातावरण में अधिक घंटे तक कार्य करना पड़ता है। मनोरंजन के नाम पर इन्हें जुआं, शराब आदि का सहारा लेना पड़ता है। निम्न आय तथा रहन-सहन के निम्न स्तर के कारण इनका स्वास्थ्य दुर्बल एवं कार्य क्षमता बहुत कम है। यदि श्रमिको को पर्याप्त सुविधायें प्रदान की जाये तो श्रमिक संतुष्ट रहते हैं और औद्योगिक शांति बनी रहती है। आज के परिवर्तित मानवीय संबंध, औद्योगिक उत्तरदायित्व और राजकीय नीति के संदर्भ में श्रमिक को केवल मजदूरी ही नहीं दी जाती वरन् उसके कल्याण का कार्य, कार्य संतुष्टि, अभिप्रेरणा, औपचारिक एवं मानवीय संबंधों के विकास का भी महत्वपूर्ण दायित्व उद्योग, सरकार और समाज पर होता है। 

 

 

 

 

स्वर्गीय श्री राजीव गांधी के अनुसार -

‘‘देश को 21वीं सदी की ओर ले जाने के लिए नितांत आवश्यक है कि हमारा श्रम संगठित, अनुशासित एवं प्रशिक्षित हो। बिना संतुष्ट श्रम के हम आगे नहीं बढ़ सकते, अतः श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन का निर्धारण अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। विकास के लिए यह भी जरूरी है कि समस्त सार्वजनिक उपक्रमों के प्रबंध में श्रमिकों की भागीदारी का सिद्धांत अनिवार्य रूप से लागू किया जाये। सेविवर्गीय प्रशासन के सिद्धांतों का अनुकरण मधुर औद्योगिक संबंधों की स्थापना में सहाय होगा।’’

 

किसी संगठन या संयंत्र के कर्मचारी के लिए उनके कार्य क्षेत्र स्थिति को निश्चित करके उनके कार्यों, दायित्वों, अधिकारों तथा संबंधों की व्याख्या स्पष्ट रूप से कर दी जाती है, तब ऐसे संगठन को औपचारिक संगठन कहते हैं। इस प्रकार के संगठन में निर्धारित नियमों, पद्धतियों तथा कार्य प्रणालियों का अनुकरण कठोरता से किया जाता है। संगठन में कार्यरत कर्मचारी एवं श्रमिक संगठन के नियमों के अनुसार एक-दूसरे से व्यवहार करते हैं।

 

श्रम कल्याण कार्य की शुरूवात औद्योगिक क्रांति के साथ हो गया था। वर्तमान शताब्दी में श्रम कल्याण कार्य का विकास कारखाना पद्धति की शुरूवात औद्योगिकरण की प्रगति और नवीन तकनीकी के अपनाने के कारण हुआ है। आधुनिक कल्याण कार्य उद्योग में बेहतर और ज्यादा कुशल प्रबंध के लिए चलाए जा रहे, आंदोलन और मानवीय दृष्टिकोण का नतीजा है। द्वितीय महायुद्ध के बाद इस विषय पर सरकारों के महत्व का अनुभव किया गया। भारत में श्रम कल्याण  कार्यों का प्रारंभ द्वितीय महायुद्ध के उपरांत ही हुआ। सामान्यतः श्रम कल्याण कार्यों के अंतर्गत श्रमिकों के बौद्धिक, शारीरिक, नैतिक एवं आर्थिक विकास से संबंधित कार्यों को शामिल किया जाता है।

 

अध्ययन का उद्देश्य

इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यूनीक स्ट्रक्चर एवं टावर्स लिमिटेड उरला संयंत्र में कार्यरत श्रमिकों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति के संबंध में जानकारी प्राप्त करना जिसके अंतर्गत जाति, आयु, शैक्षणिक एवं आय स्तर का अध्ययन तथा संयंत्र में कार्यरत श्रमिकों में कार्य की संतुष्टि संबंधी अध्ययन करना।

 

शोध प्रविधि

अध्ययन का क्षेत्र

यूनीक स्ट्रक्चर एवं टावर्स लिमिटेड रायपुर जिले के औद्योगिक क्षेत्र उरला में स्थित है। औद्योगिक क्षेत्र उरला, छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर से 12 कि.मी. पश्चिम की ओर स्थित है। रायपुर, छत्तीसगढ़ राज्य का सबसे बड़ा शहर है, तथा नवनिर्मित राज्य छत्तीसगढ़ की राजधानी भी। छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण 1 नवम्बर 2000 को हुआ है। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में 30 जिले हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर राजनीतिक एवं प्रशासनिक गतिविधियों का केन्द्र होने के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्र भी है जहां पर अनेक छोटे-बड़े उद्योग स्थापित है। उरला, रायपुर का प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है।

 

समंकों का संकलन

प्रस्तुत अध्ययन प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है। प्राथमिक समंकों का एकत्रीकरण अनुसूची द्वारा किया गया है। श्रमिकों को उत्तरदाताओं के रूप में चयन करने के लिए यह भी ध्यान में रखा गया है कि संयंत्र में स्तरीकरण में उच्च पदस्थ श्रमिक एवं कर्मचारी भी जाये।

 

तथ्यों के संकलन में साक्षात्कार अनुसूची का प्रयोग किया गया है तथा साक्षात्कार के द्वारा उत्तरदाताओं से जानकारी प्राप्त की गई। अध्ययन के दौरान अवलोकन प्रविधि का भी प्रयोग किया गया तथा आवश्यकता पड़ने पर उत्तरदाताओं से औपचारिक बातचीत के माध्यम से भी तथ्य संकलन में सहायता प्राप्त हुई।

 

आंकड़ों का प्रस्तुतीकरण

प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण सांख्यिकीय तकनीक के माध्य से प्रतिशत विधि का प्रयोग किया गया है।

 

न्यादर्श श्रमिकों की सामाजिक एवं आर्थिक अध्ययन

आयु एवं जाति के आधार पर

आयु के आधार पर          जाति के आधार पर

आयु (वर्षों में)     न्यादर्श  प्रतिशत  जाति     न्यादर्श  प्रतिशत

15-20     15        12.5      सामान्य 08        6.7

21-25     32        26.7      पिछड़ा वर्ग         43        35.8

26-30     31        25.8      अनु.जाति         06        5.0

31-35     23        19.2      अनु.जनजाति     40        33.3

36-40     12        10.0      अन्य    23        19.2

40 से अधिक       07        5.8                          

योग 120  (100)              120       (100)

 

तालिका से ज्ञात हुआ है कि आयु के आधार पर अध्ययन में पाया गया है कि कुल न्यादर्श में से 21-25 आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक पाये गये जिनका प्रतिशत 26.7 है, जबकि सबसे कम 40 वर्ष आयु वर्ग के लोग पाये गये, जिनका प्रतिशत 5.8 पाया गया।

 

जाति के आधार पर कुल न्यादर्श में 35.8 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग के पाये गये, जो सबसे अधिक है। इसी प्रकार सबसे कम अनुसूचित जाति वर्ग के पाये गये, जिसका प्रतिशत 5.0 है।

शिक्षा का स्तर

शिक्षा का स्तर

शिक्षा    न्यादर्श  प्रतिशत

अशिक्षित          38        31.6

प्रायमरी  26        21.4

पूर्व माध्यमिक     30        25.0

माध्यमिक         15        12.6

उच्चतर  11        9.1

योग 120  (100)

तालिका से ज्ञात हुआ है कि शिक्षा के आधार पर कुल न्यादर्श में सबसे अधिक अशिक्षित स्तर के हैं, जिनका प्रतिशत 31.6 है, जबकि सबसे कम उच्चतर स्तर शिक्षा प्राप्त लोगों की संख्या है, जिनका प्रतिशत 9.1 है।

 

आय स्तर

मासिक आय  (रूपये में)    न्यादर्श  प्रतिशत

1000 से 2000 रू.   48        40.0

2001 से 3000 रू.   40        33.3

3001 से 4000 रू.   18        15.0

4001 से 5000 रू.   09        7.5

5001 से अधिक    05        4.2

योग 120  (100)

 

तालिका से पता चलता है कि आय-स्तर का अध्ययन करने पर कुल न्यादर्श में सबसे अधिक 1000 से 2000 रू. तक के आय वाले लोगों की संख्या अधिक है, जिनका प्रतिशत 40 पाया गया, जबकि सबसे कम 5001 से अधिक तक के लोग पाये गये, जिनका प्रतिशत 4.2 है। इससे ज्ञात होता है कि कार्यरत श्रमिक में अधिक आय वाले लोगों की अपेक्षा कम आय वाले लोगों की संख्या अधिक है।

 

न्यादर्श में कार्य की संतुष्टि

नगरीकरण तथा व्यवसाय के बढ़ते हुए स्वरूप के कारण आय वर्तमान समय में प्रत्येक व्यक्तियों को अपनी योग्यता के अनुरूप कार्य मिलना असंभव प्रतीत होने लगा है। ऐसी दशा में वे कम वेतन पर भी काम करने के लिए सहमत हो जाते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि उनकी योग्यता को विकसित होने का पूर्व अवसर नहीं मिला और वे अनेक कुंठाओं को शिकार होने लगे। ऐसी दशा में यह आवश्यक है कि उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार कार्य मिले और साथ ही पद के अनुसार उचित वेतन भी।

 

जो कर्मचारी अपने कार्य से संतुष्ट हैं वे स्वस्थ मानसिक संतुलन रखते हैं जो उन्हें बनाये रखता है, उसमें हा्रस नहीं होने देता। यदि कर्मचारी असंतुष्ट हैं तो इससे उत्पादन क्षमता का हा्रस होता है और संगठन अपने उद्देश्य और लक्ष्यों की प्राप्ति में असफल हो सकता है। अतः उचित उत्पादन लक्ष्यांे की प्राप्ति के लिए कर्मचारियों का संतुष्ट होना आवश्यक है।

 

श्रमिकों की कार्य संतुष्टि

कार्य संतुष्टि       न्यादर्श  प्रतिशत

हाॅं    34        28.33

नहीं 86   71.67

योग 120  (100)

 

तालिका से पता चलता है कि आय स्तर का अध्ययन करने पर कुल न्यादर्श में कार्यरत श्रमिक अपने कार्य से संतुष्ट नहीं हैं जिनका प्रतिशत 71.67 है, जबकि 28.33 प्रतिशत श्रमिक अपने वर्तमान कार्य से संतुष्ट हैं। इससे ज्ञात होता है कि श्रमिक अपने वर्तमान कार्य से संतुष्ट नहीं है, कम वेतन प्राप्त होने के कारण संतुष्टि का स्तर कम है।

श्रमिकों में कार्य असंतुष्टि का कारण

कार्य असंतुष्टि का संबंध बहुत हद तक पारिश्रमिक से होता है। यदि काम के अनुसार वेतन मिलता है तो कार्य करने में मन लगता है और यदि कार्य के अनुसार वेतन नहीं मिलता है तो कार्य में असंतुष्टि पायी जाती है।

 

कार्य असंतुष्टि का कारण

कार्य असंतुष्टि का कारण   न्यादर्श  प्रतिशत

कम वेतन         75        62.5

वेतन समय पर मिलना  15        12.5

अफसरों का व्यवहार ठीक होना    09        7.5

कार्य की असुरक्षा  13        10.8

अन्य कारण       08        6.7

योग 120  (100)

 

तालिका से ज्ञात होता है कि श्रमिकों में कार्य असंतुष्टि का कारण उन्हें कम वेतन मिलना है, जिसका प्रतिशत 62.5 है, जबकि कम कुछ अन्य कारणों से वे अपने कार्य से संतुष्ट नहीं है, जिसका प्रतिशत 6.7 है।

 

निष्कर्ष

प्रस्तुत अध्ययन में निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि संयंत्र में श्रम कल्याण से संबंधित कार्य संतोषजनक रूप से संपादित नहीं किये जाते, इस संबंध में शासन के नियमों का भी पालन नहीं होता है। अनौपचारिक संबंध श्रमिकों के मध्य आपस में तो पाये गये, किन्तु प्रबंधकों एवं श्रमिकों के मध्य अनौपचारिक संबंध विकसित नहीं है। कार्य एवं वेतन में अधिकांश श्रमिक असंतुष्ट पाये गये। सामाजिक सुरक्षा हेतु यद्यपि संयंत्र द्वारा उपाय किये गये हैं, किन्तु ये प्रयास पूर्णतः सफल नहीं हुये।

 

संदर्भ ग्रन्थ

1.   बघेल, डी.एस., ‘औद्योगिक समाजशास्त्र’, पुष्पराज प्रकाशन, रींवा 1969.

2.   ैमगमदंए त्ण्ब्ण्ए ष्स्ंइवनत च्तवइसमउ ैवबपंस ॅमसंितम ंदक ैमबनतपजलष्ए च्नइसपबंजपवद ब्मदजतमए स्नबादवू 1959ण्

3.   ळपतपए टण्टण्ए ष्स्ंइवनत च्तवइसमउ पद प्दकपं प्दकनेजतलष्ए छमू क्मसीप 1962ण्

4.   च्ंदकमए ठंसमेीूंतए ष्स्ंइवनत ॅमसंितम पद प्दकपंष्ए न्ण्च्ण् भ्पदकप ळतंदजी ।बंकमउलए स्नबादवू 1975ण्

5.   ज्ञींतमए च्ण्ब्ण् ंदक टण्ब्ण् ैपदींए ष्प्दकनेजतपंस ैवबपवसवहलष्ए छंजपवदंस च्नइसपेीपदह भ्वनेमए 1984ण्

 

Received on 15.01.2012

Revised on 15.02.2012

Accepted on 18.03.2012     

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Research J.  Humanities and Social Sciences. 3(2): April-June, 2012, 217-219